40 की उम्र के बाद आईवीएफ (IVF) का सच: ब्रिटिश स्टडी में बड़ा खुलासा, जानें डोनर एग्स और खुद के अंडों की सफलता दर का पूरा गणित
आधुनिक जीवनशैली, करियर की व्यस्तता और देर से शादी करने के चलन ने समाज में मातृत्व की उम्र को काफी पीछे धकेल दिया है। आज के दौर में 35 या 40 की उम्र के बाद गर्भधारण करना एक आम बात बनती जा रही है। इस उम्र में प्राकृतिक रूप से गर्भधारण न होने पर अधिकांश जोड़े सहायक प्रजनन तकनीक (Assisted Reproductive Technology – ART) यानी आईवीएफ (In Vitro Fertilization) का सहारा लेते हैं। लेकिन क्या बढ़ती उम्र में आईवीएफ वास्तव में उतना ही सफल है जितना कि विज्ञापनों में दावा किया जाता है? ब्रिटेन में हुए एक ऐतिहासिक और बेहद विस्तृत अध्ययन ने इस विषय पर एक बड़ा सच सामने रखा है, जिसने चिकित्सा जगत और संतान की चाह रखने वाले दंपत्तियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
यह शोध उन महिलाओं के लिए एक आंखें खोलने वाली रिपोर्ट है जो 40 वर्ष की आयु पार करने के बाद अपने स्वयं के अंडों से मां बनने की उम्मीद संजोए हुए हैं। इस वैज्ञानिक अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि उम्र का असर केवल शारीरिक ऊर्जा पर ही नहीं, बल्कि महिला के अंडों की गुणवत्ता पर भी बेहद गंभीर रूप से पड़ता है। ऐसे में आईवीएफ तकनीक की सफलता दर उम्र के साथ किस तरह प्रभावित होती है, इसे समझना बेहद जरूरी हो गया है।
घटना का विस्तृत विवरण: क्या हुआ और कैसे बिगड़े हालात?
ब्रिटेन की ‘ह्यूमन फर्टिलाइजेशन एंड एम्ब्रियोलॉजी अथॉरिटी’ (HFEA) के सहयोग से किए गए इस विशाल अध्ययन में 12 लाख से अधिक एआरटी (ART) चक्रों (Cycles) के डेटा का विश्लेषण किया गया। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना था कि विभिन्न आयु वर्गों में महिलाओं के अपने अंडों (Self Eggs) और डोनर के अंडों (Donor Eggs) के उपयोग से आईवीएफ की सफलता दर में कितना अंतर आता है।
अध्ययन के चौंकाने वाले नतीजों से पता चला कि जैसे ही महिला की उम्र 40 वर्ष पार होती है, उसके अपने अंडों से गर्भधारण करने और एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देने की संभावना तेजी से गिरने लगती है। विशेष रूप से 43 वर्ष या उससे अधिक उम्र की महिलाओं में अपने अंडों के जरिए आईवीएफ की सफलता दर महज 5 प्रतिशत से भी कम (लगभग 3.5% से 4.8%) दर्ज की गई। इसका सीधा मतलब यह है कि इस उम्र में अपने अंडों से आईवीएफ कराने वाली हर 100 महिलाओं में से 95 से अधिक महिलाओं को विफलता का सामना करना पड़ता है।
जमीनी हकीकत, प्रभावित क्षेत्र और तकनीकी/राजनीतिक पहलू
इस जैविक गिरावट के पीछे का वैज्ञानिक कारण महिलाओं के शरीर में अंडों के निर्माण की प्राकृतिक प्रक्रिया है। पुरुष जहां जीवनभर नए शुक्राणुओं का निर्माण कर सकते हैं, वहीं महिलाएं एक निश्चित संख्या में अंडों के साथ ही पैदा होती हैं। उम्र बढ़ने के साथ, विशेषकर 35 वर्ष के बाद, इन अंडों की संख्या (Egg Reserve) और उनकी आनुवंशिक गुणवत्ता (Genetic Quality) दोनों में भारी गिरावट आती है।
40 की उम्र के बाद बनने वाले अंडों में क्रोमोसोमल असामान्यताएं (Chromosomal Abnormalities) या आनुवंशिक दोष होने की संभावना 70 से 80 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। ऐसे अंडों से जब भ्रूण (Embryo) तैयार किया जाता है, तो या तो वह गर्भाशय में प्रत्यारोपित (Implant) नहीं हो पाता, या फिर प्रत्यारोपण के बाद शुरुआती हफ्तों में ही गर्भपात (Miscarriage) हो जाता है। यही कारण है कि इस उम्र में अपने अंडों से आईवीएफ की सफलता दर इतनी निराशाजनक स्तर पर पहुंच जाती है।
सरकारी रुख, आधिकारिक बयान और प्रशासन की कार्रवाई
भारत के संदर्भ में बात करें तो देश में भी देर से माता-पिता बनने का चलन महानगरों में तेजी से बढ़ा है। भारत सरकार ने इस क्षेत्र को विनियमित करने और मरीजों के हितों की रक्षा के लिए ‘सहायक प्रजनन तकनीक (विनियमन) अधिनियम, 2021’ (ART Regulation Act, 2021) लागू किया है। इस कानून के तहत भारत में आईवीएफ उपचार के लिए महिलाओं की अधिकतम आयु सीमा 50 वर्ष और पुरुषों के लिए 55 वर्ष निर्धारित की गई है।
हालांकि, कानूनन 50 वर्ष तक आईवीएफ की अनुमति है, लेकिन भारतीय फर्टिलिटी क्लीनिकों में भी डॉक्टरों का मानना है कि 40 के बाद महिलाओं को डोनर एग्स के विकल्पों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के दिशानिर्देशों के अनुसार, डॉक्टरों की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वे मरीजों को उनकी उम्र के अनुसार सफलता की वास्तविक संभावनाओं के बारे में पूरी तरह से सूचित करें और उन्हें किसी भी प्रकार के भ्रामक विज्ञापनों से बचाएं।
आर्थिक, सामाजिक और आम जनजीवन पर गहरा असर
आईवीएफ केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह अत्यधिक खर्चीली और मानसिक रूप से थका देने वाली यात्रा भी है। भारत में एक आईवीएफ चक्र (IVF Cycle) की औसत लागत 1.5 लाख से 3 लाख रुपये तक होती है। जब कोई दंपत्ति बिना सही वैज्ञानिक जानकारी के 40 की उम्र के बाद बार-बार अपने अंडों से आईवीएफ का प्रयास करता है, तो उन्हें न केवल भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ता है, बल्कि बार-बार मिलने वाली विफलता से वे गहरे मानसिक अवसाद (Depression) और वैवाहिक तनाव का शिकार भी हो जाते हैं।
इसके विपरीत, डोनर एग्स (Donor Eggs) का उपयोग करने पर सफलता की दर में जादुई बदलाव आता है। ब्रिटिश अध्ययन के अनुसार, जब 43 वर्ष या उससे अधिक उम्र की महिलाओं में युवा और स्वस्थ डोनर के अंडों का उपयोग किया गया, तो आईवीएफ की सफलता दर बढ़कर एक-तिहाई (33% से अधिक) हो गई। इसका कारण यह है कि डोनर एग्स आमतौर पर 20 से 30 वर्ष की स्वस्थ महिलाओं से लिए जाते हैं, जिनकी आनुवंशिक गुणवत्ता उत्कृष्ट होती है।
“उम्र बढ़ने के साथ आईवीएफ की सफलता दर का गिरना एक अटल प्राकृतिक सत्य है। 40 के बाद डोनर एग्स का चयन करना कोई विफलता नहीं है, बल्कि यह एक स्वस्थ बच्चे को जन्म देने की संभावना को कई गुना बढ़ा देता है। क्लीनिकों को मरीजों को झूठी उम्मीदें देने के बजाय पारदर्शी डेटा दिखाना चाहिए ताकि वे सही समय पर सही निर्णय ले सकें।”
मुख्य बिंदु और प्रमुख आंकड़े
- अध्ययन का विशाल दायरा: ब्रिटेन में 12 लाख से अधिक एआरटी (ART) चक्रों के डेटा का गहन विश्लेषण किया गया।
- 43+ की उम्र में सफलता दर: अपने स्वयं के अंडों (Self Eggs) का उपयोग करने पर सफलता की संभावना 5% से भी कम रह जाती है।
- डोनर एग्स का चमत्कारी प्रभाव: डोनर अंडों के उपयोग से 43 वर्ष से अधिक उम्र में भी सफलता दर बढ़कर 33% से अधिक (एक-तिहाई) हो जाती है।
- भारत में कानूनी सीमा: एआरटी कानून 2021 के तहत महिलाओं के लिए आईवीएफ की अधिकतम आयु सीमा 50 वर्ष तय है।
- क्रोमोसोमल असामान्यता: 40 वर्ष के बाद उत्पादित होने वाले अधिकांश अंडों में आनुवंशिक दोष होने की संभावना 70-80% तक बढ़ जाती है।
- वैकल्पिक समाधान: युवावस्था में ‘एग फ्रीजिंग’ (Egg Freezing) कराना देर से गर्भधारण की योजना बनाने वाली महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित तकनीकी उपाय है।
विशेषज्ञों की राय और भविष्य की चुनौतियां
देश के जाने-माने आईवीएफ विशेषज्ञों और स्त्री रोग विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं को 30 से 35 वर्ष की उम्र के बीच ही अपनी फर्टिलिटी प्लानिंग कर लेनी चाहिए। यदि किसी कारणवश करियर या व्यक्तिगत कारणों से गर्भावस्था में देरी हो रही है, तो ‘एग फ्रीजिंग’ (Egg Freezing) एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है। इसके तहत महिला अपने युवावस्था (जब अंडों की गुणवत्ता सर्वोत्तम होती है) के अंडों को भविष्य के लिए सुरक्षित रख सकती है और बाद में जब चाहे आईवीएफ के जरिए गर्भधारण कर सकती है।
भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती समाज में डोनर एग्स को लेकर बनी हिचक और रूढ़िवादिता को दूर करना है। कई दंपत्ति आनुवंशिक जुड़ाव (Genetic Connection) के मोह में अपने अंडों से बार-बार असफल प्रयास करते रहते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे के पालन-पोषण और मातृत्व का सुख केवल आनुवंशिकी तक सीमित नहीं है। डोनर एग्स की तकनीक ने उन लाखों महिलाओं के लिए मातृत्व का सुख पाना संभव बनाया है जो अपनी ढलती उम्र के कारण निराश हो चुकी थीं। समय आ गया है कि फर्टिलिटी क्लीनिकों में अधिक पारदर्शिता और नैतिक मानकों का पालन सुनिश्चित किया जाए ताकि कोई भी दंपत्ति गुमराह न हो।
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