Saturday, October 17, 2026 • India Edition

सदैव सच की ओर

BREAKING NEWS ताज़ा खबर

बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर रोक की मांग पर SC की दो टूक- ‘उनका भी मौलिक अधिकार’, जानें पूरा फैसला

बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर रोक की मांग पर SC की दो टूक- ‘उनका भी मौलिक अधिकार’, जानें पूरा फैसला

📌 प्रमुख बातें व मुख्य बिंदु (Key Highlights):

  • सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार किया।
  • अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 के तहत बच्चों को भी सूचना, ज्ञान और डिजिटल अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार प्राप्त है।
  • बेंच ने सरकार और टेक कंपनियों को चाइल्ड सेफ्टी टूल्स और पेरेंटल कंट्रोल तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता बताई।
  • अदालत ने कहा कि समस्या तकनीक में नहीं बल्कि अनियंत्रित और असुरक्षित एक्सेस में है, जिसे नियमन से सुधारा जाना चाहिए।

देश की शीर्ष अदालत ने बच्चों के डिजिटल स्पेस और ऑनलाइन दुनिया में अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक और प्रगतिशील दृष्टिकोण पेश किया है। सुप्रीम कोर्ट में बच्चों के इंटरनेट और सोशल मीडिया इस्तेमाल पर वैधानिक प्रतिबंध लगाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान पीठ ने दो टूक शब्दों में कहा कि बच्चों के भी मौलिक अधिकार होते हैं और डिजिटल युग में उन्हें सूचना व शिक्षा के संसाधनों से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने साफ किया कि तकनीक के संभावित नुकसानों से निपटने का रास्ता पूर्ण पाबंदी नहीं, बल्कि सशक्त सुरक्षा तंत्र और नियमन है।

प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली विशेष पीठ ने याचिका की सुनवाई करते हुए इस बात को रेखांकित किया कि आधुनिक समय में इंटरनेट केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह सीखने, रचनात्मकता और ज्ञान अर्जन का मुख्य माध्यम बन चुका है। अदालत ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 केवल वयस्कों तक सीमित नहीं है; जीवन, गरिमा और अभिव्यक्ति के अधिकार के दायरे में देश की भावी पीढ़ी भी समान रूप से शामिल है। इंटरनेट पर एकतरफा रोक लगाने से बच्चों के स्वाभाविक और मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

घटना का विस्तृत विवरण: क्या हुआ और कैसे बिगड़े हालात?

सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका एक नागरिक संगठन की ओर से दाखिल की गई थी, जिसमें नाबालिगों में बढ़ती स्क्रीन लत, साइबर बुलिंग, ऑनलाइन गेमिंग के दुष्प्रभावों और हानिकारक सामग्री तक आसान पहुंच को लेकर गहरी चिंता जताई गई थी। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया और सामान्य इंटरनेट एक्सेस को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए और इसके उल्लंघन पर दंडात्मक प्रावधान तय किए जाएं।

याचिका में तर्क दिया गया था कि कोविड-19 महामारी के बाद से ऑनलाइन कक्षाओं के नाम पर बच्चों के हाथों में डिजिटल उपकरण आए, जिसके बाद बच्चों में मानसिक अवसाद, ध्यान केंद्रित करने में कमी और साइबर अपराधों के शिकार होने की घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। याचिकाकर्ता का कहना था कि कई विकसित देशों की तरह भारत में भी बच्चों के लिए सख्त डिजिटल आयु सीमा निर्धारित की जानी चाहिए। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों पर सहमति जताते हुए भी यह स्पष्ट किया कि बीमारी का इलाज मरीज को खत्म करना नहीं हो सकता।

“हम 21वीं सदी के तीसरे दशक में जी रहे हैं। इंटरनेट आज बुनियादी साक्षरता और शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह अलग-थलग कर देना उनके बौद्धिक विकास को अवरुद्ध कर देगा। हमें बच्चों को सुरक्षित वातावरण देना है, न कि उन्हें तकनीकी अंधेरे में धकेलना है। बच्चों के भी अपने मौलिक अधिकार हैं।” – सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणी

जमीनी हकीकत, तकनीकी पहलू और प्रशासनिक कार्रवाई

भारत वर्तमान में दुनिया का सबसे बड़ा कनेक्टेड डिजिटल समाज है, जहां 90 करोड़ से अधिक सक्रिय इंटरनेट उपभोक्ता हैं। जमीनी हकीकत यह है कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में स्कूली शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और सामान्य ज्ञान के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की अनिवार्यता स्थापित हो चुकी है। ऐसे में किसी भी प्रकार का पूर्ण प्रतिबंध न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि यह डिजिटल डिवाइड (डिजिटल असमानता) को और गहरा कर सकता है।

तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून बनाकर बच्चों को इंटरनेट से दूर नहीं रखा जा सकता, क्योंकि प्रॉक्सी नेटवर्क, वीपीएन और अनधिकृत प्लेटफॉर्म्स प्रतिबंधों को आसानी से दरकिनार कर देते हैं। इस मामले में प्रशासनिक स्तर पर ठोस नियामक ढांचे की आवश्यकता है। अदालत ने भी माना कि जिम्मेदारी केवल माता-पिता पर नहीं डाली जा सकती, बल्कि बड़ी टेक कंपनियों (Big Tech) और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को बाल सुरक्षा के लिए अपने एल्गोरिदम को पुनर्गठित करना होगा।

  • एज-वेरिफिकेशन फ्रेमवर्क: प्लेटफॉर्म्स को बायोमेट्रिक या मजबूत डिजिटल पहचान तंत्र के जरिए सटीक उम्र सत्यापन लागू करना होगा ताकि नाबालिग अनुचित सामग्री तक न पहुंच सकें।
  • एल्गोरिदम ऑडिट: बच्चों के खातों पर एडिटिव और एंगेजमेंट-ड्रिवन एल्गोरिदम पर लगाम लगाने के लिए सख्त दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है।
  • डेटा ट्रैकिंग पर रोक: नाबालिगों के पर्सनल डेटा की प्रोफाइलिंग और टार्गेटेड विज्ञापनों पर तत्काल प्रभाव से रोक का क्रियान्वयन जरूरी है।
  • पेरेंटल डैशबोर्ड: हर डिजिटल सर्विस में अभिभावकों के लिए पारदर्शी और उपयोग में आसान कंट्रोल टूल्स की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।

कानूनी प्रावधान, आईटी नियम और संवैधानिक अधिकार

भारतीय न्यायशास्त्र के तहत बच्चों के अधिकारों को हमेशा सर्वोपरि माना गया है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act, 2000) और आईटी मध्यवर्ती दिशानिर्देश नियम, 2021 के तहत ऑनलाइन मध्यवर्तियों के लिए पहले से ही कुछ सुरक्षा प्रावधान मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम के प्रावधान स्पष्ट रूप से किसी भी संस्था को बच्चों के ऐसे डेटा को प्रोसेस करने से रोकते हैं जिससे उनके शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता हो।

अदालत ने सुनवाई के दौरान रेखांकित किया कि कानूनी रूप से माता-पिता को स्वाभाविक संरक्षक माना गया है, परंतु राज्य का दायित्व भी ‘पैरेन्स पैट्रिए’ (Parens Patriae) सिद्धांत के तहत बनता है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत सूचना पाने का अधिकार और विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता बच्चों को भी प्राप्त है, जिसे अनुच्छेद 19(2) के तहत केवल ‘उचित प्रतिबंधों’ (Reasonable Restrictions) के आधार पर ही सीमित किया जा सकता है, पूर्ण निषेध के जरिए नहीं।

विशेषज्ञों की राय, सामाजिक असर और भविष्य की चुनौतियां

बाल मनोवैज्ञानिकों और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने सुप्रीम कोर्ट के इस दृष्टिकोण का स्वागत किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि आज की दुनिया में डिजिटल साक्षरता ही बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने की सबसे बड़ी ढाल है। यदि बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया जाएगा, तो वे चुपके से असुरक्षित तरीकों से इसका इस्तेमाल करेंगे, जिससे उनके गंभीर साइबर अपराधों के जाल में फंसने का जोखिम कई गुना बढ़ जाएगा।

सामाजिक दृष्टिकोण से यह मामला केवल कानूनी नहीं, बल्कि पारिवारिक संवाद और जागरूकता का भी है। शिक्षण संस्थानों को अपने पाठ्यक्रम में साइबर हाइजीन और डिजिटल एथिक्स को प्राथमिकता देनी होगी। परिवारों के भीतर स्क्रीन टाइम के स्वस्थ नियम, स्क्रीन-मुक्त पारिवारिक समय और बच्चों के साथ खुली बातचीत ही इस चुनौती का वास्तविक समाधान पेश कर सकती है।

निष्कर्षतः, सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भारत के डिजिटल भविष्य के लिए एक अत्यंत संतुलित और परिपक्व दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। तकनीक से डरकर भागने के बजाय तकनीक को मानवीय और बाल-अनुकूल बनाना ही एक प्रगतिशील लोकतंत्र की पहचान है। अदालत के इस स्पष्ट संदेश के बाद अब गेंद नीति निर्माताओं और तकनीकी दिग्गजों के पाले में है कि वे बच्चों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करते हुए एक सुरक्षित, जवाबदेह और रचनात्मक डिजिटल भारत का निर्माण कैसे सुनिश्चित करते हैं।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ):

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर क्या मुख्य टिप्पणी की?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट आज शिक्षा और व्यक्तिगत विकास का अभिन्न हिस्सा है। बच्चों के भी मौलिक अधिकार हैं और उन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना न तो व्यावहारिक है और न ही संवैधानिक रूप से उचित।

याचिकाकर्ता की मुख्य मांग क्या थी?

याचिकाकर्ता ने नाबालिगों में बढ़ती स्क्रीन लत, साइबर अपराध, मानसिक तनाव और अश्लील सामग्री के खतरे का हवाला देते हुए एक निश्चित आयु तक बच्चों के इंटरनेट और सोशल मीडिया उपयोग पर वैधानिक रोक लगाने की मांग की थी।

अदालत ने इंटरनेट सुरक्षा के लिए क्या विकल्प सुझाए?

अदालत ने सख्त पेरेंटल कंट्रोल, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) नियमों के कड़े अनुपालन, आयु सत्यापन (Age Verification) और स्कूलों में डिजिटल साक्षरता अभियानों पर जोर दिया।

{“@context”:”https://schema.org”,”@type”:”FAQPage”,”mainEntity”:[{“@type”:”Question”,”name”:”सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर क्या मुख्य टिप्पणी की?”,”acceptedAnswer”:{“@type”:”Answer”,”text”:”सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट आज शिक्षा और व्यक्तिगत विकास का अभिन्न हिस्सा है। बच्चों के भी मौलिक अधिकार हैं और उन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना न तो व्यावहारिक है और न ही संवैधानिक रूप से उचित।”}},{“@type”:”Question”,”name”:”याचिकाकर्ता की मुख्य मांग क्या थी?”,”acceptedAnswer”:{“@type”:”Answer”,”text”:”याचिकाकर्ता ने नाबालिगों में बढ़ती स्क्रीन लत, साइबर अपराध, मानसिक तनाव और अश्लील सामग्री के खतरे का हवाला देते हुए एक निश्चित आयु तक बच्चों के इंटरनेट और सोशल मीडिया उपयोग पर वैधानिक रोक लगाने की मांग की थी।”}},{“@type”:”Question”,”name”:”अदालत ने इंटरनेट सुरक्षा के लिए क्या विकल्प सुझाए?”,”acceptedAnswer”:{“@type”:”Answer”,”text”:”अदालत ने सख्त पेरेंटल कंट्रोल, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) नियमों के कड़े अनुपालन, आयु सत्यापन (Age Verification) और स्कूलों में डिजिटल साक्षरता अभियानों पर जोर दिया।”}}]}

← PREVIOUS STORY

Leave a Reply