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डिजिटल रेप मामले में अदालत का निर्देश: जैविक साक्ष्य संग्रह में संवेदनशीलता बढ़ाने की बात; ‘डिजिटल’ का क्या मतलब है?

डिजिटल रेप मामले में अदालत का निर्देश: जैविक साक्ष्य संग्रह में संवेदनशीलता बढ़ाने की बात; ‘डिजिटल’ का क्या मतलब है?

दिल्ली की एक अदालत ने पुलिस अधिकारियों से आग्रह किया है कि वे डिजिटल रेप मामलों में जैविक साक्ष्य एकत्र करते समय अधिक संवेदनशील हों, जिसमें नाखूनों के कतरन या उंगलियों की स्क्रैपिंग जैसे नमूनों को शामिल किया जाए। अदालत का यह निर्देश उस समय आया जब एक व्यक्ति को एक नाबालिग से बलात्कार के मामले में दोषी ठहराया गया।

जैविक साक्ष्य का महत्व क्या है? जैविक साक्ष्य का उपयोग डीएनए विश्लेषण के लिए किया जाता है, जिससे अपराधी की पहचान स्थापित की जा सकती है।

डिजिटल रेप क्या है? डिजिटल रेप एक नया शब्द है, जिसका ‘डिजिटल’ शब्द से कोई लेना-देना नहीं है (यह वर्चुअल या ऑनलाइन नहीं है)। इसका मतलब है, जब आरोपित अपनी उंगलियों या पंजों का उपयोग पीड़िता के निजी अंगों को छूने के लिए करता है। ‘डिजिटल रेप’ का मतलब है पीड़िता के शरीर पर बिना सहमति के हमला करना।

अदालत उस मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक व्यक्ति पर नाबालिग से बलात्कार करने का आरोप था। उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) और बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (POCSO) के तहत गंभीर यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराया गया था।

अतिरिक्त लोक अभियोजक शरवण कुमार बिश्नोई ने कहा कि आरोपित ने अक्टूबर 2021 में यह अपराध किया, और इस अपराध को ocular, मेडिकल और फॉरेन्सिक साक्ष्यों के माध्यम से साबित किया गया था।

17 जनवरी को एक आदेश में अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने आरोपित के खिलाफ अभियुक्त करने वाले परिस्थितियों को साबित किया, जिनमें पीड़िता की मां का उसकी चीखें सुनना, आरोपित के गोद में उसकी बेटी को पाना और उसके निजी अंगों पर चोटें लगना शामिल था।

अदालत ने कहा, “यहां बिल्कुल भी कोई कारण नहीं है कि अभियोजन पक्ष के गवाह (माँ) आरोपित को गलत तरीके से फंसा सकते थे, क्योंकि वह उसे जानती तक नहीं थी।”

अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले में डिजिटल रेप हुआ था, इसलिए जांच एजेंसी को आरोपी के दोनों हाथों की नाखून कतरन और उंगलियों की स्क्रैपिंग एकत्र करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

अदालत ने यह भी सिफारिश की कि प्री-प्यूबर्टल (पूर्व किशोरावस्था) पीड़िताओं के मामलों में चिकित्सा परीक्षण पेडियाट्रिक गाइनकोलॉजिस्ट से कराया जाए। ASJ पुनिया ने इसके अलावा एक आदेश जारी किया कि इस फैसले की एक प्रति गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस आयुक्त को भेजी जाए, ताकि आवश्यक कार्रवाई की जा सके।

Accredited news correspondent and investigative contributor at AvaNews.in.

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