बंगाल में फिर मनेगी सांप के जहर की जीवनरक्षक दवा: 150 करोड़ के मेगा प्लांट के प्रस्ताव से स्वास्थ्य सेक्टर में हलचल, जानें 15 साल का पूरा इतिहास
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान और स्वास्थ्य ढांचे के इतिहास में एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी कदम उठाते हुए, पश्चिम बंगाल में सांप के जहर से एंटीवेनम (Anti-snake venom) बनाने के लिए एक बार फिर से मेगा प्लांट स्थापित करने की योजना पर काम शुरू हो गया है। लगभग 150 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाले इस प्रस्तावित प्लांट से न सिर्फ पश्चिम बंगाल बल्कि पूरे पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में सर्पदंश (snakebite) के मरीजों को एक नई जीवनरेखा मिलने की उम्मीद जग गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, देश में एंटीवेनम की बढ़ती मांग और आयात पर निर्भरता को कम करने के लिए यह निर्णय एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
गौर करने वाली बात यह है कि राज्य में इससे पहले भी इस तरह की जीवनरक्षक दवाओं का उत्पादन होता था, लेकिन विभिन्न प्रशासनिक, तकनीकी और वित्तीय कारणों से करीब 15 साल पहले यह प्रक्रिया ठप पड़ गई थी। इसके बाद से बंगाल और आसपास के राज्यों को अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा दूसरे राज्यों या आयातित स्रोतों से पूरा करना पड़ रहा था। वर्तमान में सर्पदंश के बढ़ते मामलों और ग्रामीण इलाकों में मौतों के आंकड़ों को देखते हुए राज्य सरकार और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस दिशा में ठोस पहल करने का मन बनाया है, जिसके तहत इस अत्याधुनिक प्लांट की रूपरेखा तैयार की जा रही है।
घटना का विस्तृत विवरण: क्या हुआ और कैसे बिगड़े हालात?
आज से डेढ़ दशक पहले तक पश्चिम बंगाल के भक्तानगर और कुछ अन्य केंद्रों पर एंटीवेनम का उत्पादन सीमित पैमाने पर होता था। लेकिन समय के साथ-साथ गुणवत्ता नियंत्रण के कड़े मानकों, उचित रख-रखाव के अभाव, और बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट के कड़े नियमों के चलते इन पुरानी इकाइयों को बंद करना पड़ा था। इसके बाद से देश के चुनिंदा हिस्सों पर ही एंटीवेनम उत्पादन का भार आ गया।
पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन, जंगलों की कटाई और कृषि क्षेत्रों के विस्तार के कारण इंसानों और सांपों का आमना-सामना बहुत बढ़ गया है। ग्रामीण बंगाल, विशेषकर सुंदरबन डेल्टा क्षेत्र, पुरुलिया, बांकुड़ा और मेदिनीपुर जैसे जिलों में हर साल मानसून के दौरान विषैले सांपों के काटने (जैसे कोबरा, क्रेट और रसेल वाइपर) के हजारों मामले सामने आते हैं। स्थानीय अस्पतालों में एंटीवेनम की समय पर उपलब्धता न होना कई बार मरीजों के लिए जानलेवा साबित होता है। इसी को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने लंबे समय से एक स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग यूनिट की मांग उठाई थी।
जमीनी हकीकत, प्रभावित क्षेत्र और तकनीकी/राजनीतिक पहलू
जमीनी स्तर पर स्थिति यह है कि सर्पदंश के मामलों में ‘गोल्डन ऑवर’ (शुरुआती एक घंटा) सबसे अहम होता है। यदि इस अवधि में सही एंटीवेनम न मिले, तो मरीज की तंत्रिका तंत्र (nervous system) फेल हो सकती है या किडनी खराब हो सकती है। नया प्रस्तावित 150 करोड़ रुपये का प्लांट केवल एक दवा बनाने की फैक्ट्री नहीं होगी, बल्कि इसमें अत्याधुनिक बायो-लैब्स, रेप्टाइल पार्क (सांपों को सुरक्षित रखने और उनसे जहर निकालने की मानवीय तकनीक), और रिसर्च सेंटर भी शामिल होंगे।
राजनीतिक रूप से भी इस मुद्दे को लेकर काफी सुगबुगाहट तेज हो गई है। विपक्षी दल जहां स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे के लंबे समय तक चरमराए रहने पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं सत्ताधारी दल इसे ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा के आधुनिकीकरण की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्लांट के आने से पश्चिम बंगाल न केवल एंटीवेनम उत्पादन में आत्मनिर्भर होगा, बल्कि वह अन्य पड़ोसी राज्यों को भी इसकी आपूर्ति कर सकेगा।
सरकारी रुख, आधिकारिक बयान और प्रशासन की कार्रवाई
राज्य के स्वास्थ्य विभाग और लोक निर्माण विभाग ने इस प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण और फिजिबिलिटी स्टडी का काम शुरू कर दिया है। सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस मेगा प्रोजेक्ट के लिए नेशनल बायोलॉजिकल लैब्स और फार्मास्युटिकल एक्सपर्ट्स से सलाह ली जा रही है।
“सर्पदंश अब केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक गंभीर जनस्वास्थ्य समस्या (Public Health Issue) बन चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी इसे उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों की श्रेणी में रखा है। हमारा यह 150 करोड़ का प्लांट अत्याधुनिक तकनीकों से लैस होगा, जो गुणवत्तापूर्ण एंटीवेनम का कम लागत पर उत्पादन सुनिश्चित करेगा।” – वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारी, पश्चिम बंगाल सरकार
आर्थिक, सामाजिक और आम जनजीवन पर गहरा असर
इस प्लांट के चालू होने से सामाजिक और आर्थिक स्तर पर दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे। किसानों और खेत मजदूरों, जो सर्पदंश के सबसे बड़े शिकार होते हैं, उनके परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी। वर्तमान में एक मरीज के इलाज में निजी अस्पतालों में भारी-भरकम खर्च आता है, जबकि सरकारी अस्पतालों में कई बार दवा की कमी बाधक बनती है। स्थानीय स्तर पर उत्पादन शुरू होने से लॉजिस्टिक्स कॉस्ट घटेगी और दवा की कीमतें आम आदमी की पहुंच में होंगी। साथ ही, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सैकड़ों युवाओं को बायोटेक, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में रोजगार के अवसर भी मिलेंगे।
मुख्य बिंदु और प्रमुख आंकड़े
- प्रस्तावित लागत: लगभग 150 करोड़ रुपये
- उत्पाद बंद होने की अवधि: पिछले लगभग 15 वर्षों से ठप थी प्रक्रिया
- मुख्य फोकस क्षेत्र: सुंदरबन, पुरुलिया, बांकुड़ा और ग्रामीण बंगाल के सर्पदंश प्रभावित इलाके
- लक्षित उत्पादन: कोबरा, क्रेट और रसेल वाइपर के जहर से बनने वाले पॉलीवेलेंट एंटीवेनम का वृहद निर्माण
- रोजगार सृजन: बायोटेक्नोलॉजी, फार्मा और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में सैकड़ों नए जॉब्स
विशेषज्ञों की राय और भविष्य की चुनौतियां
फार्माकोलॉजिस्ट्स का कहना है कि प्लांट स्थापित करना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही कठिन इसे निरंतर और मानकीकृत रखना है। सांपों से मानवीय तरीके से जहर निकालना (Milking) और उनके स्वास्थ्य की देखभाल करना एक संवेदनशील प्रक्रिया है। इसके लिए पेटा (PETA) और वन्यजीव संरक्षण कानूनों का कड़ाई से पालन करना होगा ताकि पर्यावरण संतुलन भी बना रहे।
भविष्य में इस बात की पूरी संभावना है कि यदि बंगाल सरकार इस प्रोजेक्ट को समयबद्ध तरीके से पूरा कर लेती है, तो यह देश के लिए एक मॉडल प्रोजेक्ट बन सकता है। ‘सदैव सच की ओर’ अग्रसर AVA News की टीम इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए रखेगी और प्लांट के शिलान्यास से लेकर उत्पादन तक की हर अपडेट अपने पाठकों तक पहुंचाती रहेगी।
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